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| पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का निधन हो गया |
नाइत्तेफ़ाक़ियां अपनी जगह रहनी चाहिए लेकिन विरोध को दुश्मनी करार देने से पहले के दौर में अटल बिहारी वाजयेपी से बड़ा नेता कोई नहीं हो पाया... जीत हार कई नेताओं को मिली... लेकिन हर बार विजेता अटल जी ही रहे... विश्वास मत हारे तो सबसे बड़े नेता बने, विश्वास मत जीते तो सबसे बड़े नेता... पाकिस्तान का दौरा किया तो कद और बड़ा कर लिया... करगिल हुआ तो देश के सर्वोच्च नेता... देश की संसद पर हमला हुआ तो प्रतिकार के ऐलान से बड़े देश हिल गए... आलोचना सिर्फ इतनी की जा सकती है कि अटल ने जितना किया उससे ज़्यादा नहीं किया... लेकिन ये भी असल में वाजपेयी जी का कद बाकी सब से 2 इंच ऊंचा ही कर देती है... देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विरोधी होने के बावजूद कंधे पर हाथ रख कर शाबाशी दी... यही परंपरा अटल की राजनीति की जड़ में बस गई... वाजपेयी जी ने इंदिरा को दुर्गा कहा या नहीं कहा इस पर बहस बेकार है... लेकिन यूएन हो या ईरान क्रांति के बाद भारत की चिंता... वाजपेयी भारत का चेहरा रहे... राजनैतिक विरोध के बाद भी... जनता सरकार की टूटी तो भले ही कई नेता इतिहास हो गए हों... वाजपेयी ने सिरे से नया रास्ता बनाया...

वो विपक्ष में थे तो सत्ता की आवाज़ बन जाते थे, सरकार में थे तो विरोध के स्वरों से भी इत्तेफ़ाक रखते, सार्वजनिक जीवन में मुखौटे पहनना सांस लेने जितना ही ज़रूरी होता है... लेकिन क्या वो किसी का मुखौटा थे... या दूसरों को अपना मुखौटा बनाए रखते थे... इस जटिल प्रश्न का जवाब शायद वो खुद भी न दे पाएं... एक विशुद्ध नेता की तरह वो जटिल चरित्र बनाए रहते... सच्चे ब्राह्रमण लेकिन वैष्णव नहीं, कुंवारे और ब्रह्मचारी के बीच की लकीर पर संतुलित... राम जन्मभूमि आंदोलन के केंद्र... लेकिन शिखर के अकेलेपन की चिंता में... वाजपेयी लोकतंत्र के प्रतिनिधि हैं, धर्म के, राज के... राजधर्म के... विरोध के समर्थन के... सूरज के सातों घोड़ों को लेकर चलने के प्रतिनिधि... शिव की बारात लेकर चलने के चिन्ह... अटल नेता थे... राजनेता... वो भूमिकाएं बदलते थे... लेकिन वो अटल भी थे... हर बात में अटल
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